Wednesday, 23 January 2019

सहिष्णु देश


भारत विश्व का बड़ा प्रजातांत्रिक देश है।इस देश मे सभी धर्मो के मानने बाले,बिभिन्न भाषाओ के बोलने बाले बड़े ही मेल जोल से आपसी सद्भभाव की भावना से ओतप्रोत होकर सदियो से रहते चले आये है।देश ने अपने मे कई धर्मो और भाषाओ को समाहित ही नही की बल्कि उनकी अभिरक्छा और सम्बर्धन भी की।सभी धर्मों के मानने बाले बिना कोई भेद भाव के अपनी योग्यता और छमता के आधार पर उन्नति और विकास हर छेत्र में किया है।
     दुनियां में भारत देश जैसा कोई और सहिष्णुता बाला देश नही मिलेगा।इस देश मे हर नागरिक बिना कोई डर भय के अपनी बात किसी भी समय किसी भी स्थिति में रख सकता है जिसमे किसी सरकार या संस्थान का कोई हस्तछेप नही होता ,क्योकि देश का हर नागरिक को देश की संविधान ने  बिना जाति,धर्म,लिगं,स्थान,आदि के भेद भाव के प्रदान की है ।
      इस देश मे नागरिकों की संबैधानिक अधिकारों की रखबली के रूप में हमारे संविधान में शशक्त न्यायपालिका की व्यवस्ता कर रखी है जिनके पास देश का कोई नागरिक अपनी अधिकार की सुरक्छा के लिए किसी भी समय जा सकता है।
         फिर भी देश मे कुछ सम्पन्न और अपने को तथाकथित बुद्धिजीवी प्रगतिशील कहने बाले सुबिधा सम्पन्न लोगों को जो अपनी बात बिना कोई भेद भाव के कह रहे हैं यह देश असहिष्णु और असुरक्छित लगता है।ऐसे लोग बतानुकूलित कमरों में बैठ कर आराम से महंगी खानो या पेय का घुट पीते हुए  सरकार की आलोचना खुलेआम करते है ।वही दूसरी ओर  देश की सामान्य नागरिक जो खुशी से देश मे रहते है उन्हें ना तो कोई डर लगता है और न ही देश उनके लिए असहिष्णु और असुरक्छित लगता है ।उन्हें तो देश मे कोई भेद भाव नजर भी नजर नही आती है।ऐसे नागरिक को देश उनकी मातृभूमि है जिसकी आलोचना ऎसे नागरिक को मंजूर नही।ये हर हाल में देश के लिए अपना सर्वश्व नौछावर को ततपर रहते है।ऐसे देश के नागरिकों को सत सत नमन।
            लेकिन सब के बाबजूद हमारे देश मे कुछ सम्पन्न और तथाकथित आपने को बुद्धिजीवी वर्ग कहलाने बाले व्यक्तियों को इस देश मे रहना सुरक्छित नही लगता है।हमेशा उन्हें डर लगता है भले वे सुरक्छा घेरे में रहते हों।ऐसे लोगो मे देश की कुछ नेताओ के साथ साथ बड़े बड़े कलाकारों,तथाकथित लेखको,विचारको तक सुमार हैं।
           जब जब देश के किसी राज्य में चुनाव का मौसम आता है या देश मे आम चुनाव आने को होता है ऐसे राजनीतिक विचारक,लेखकों,बुद्धिजीवियो,कलाकारों,और सामाजिक तथाकथित कार्यकर्ताओं को देश रहने लायक नही दिखता है, उन्हें देश की हालात असहिष्णु और डरावना लगता है ।ऐसे लोगो के द्वारा दूरदर्शन पर,समाचार पत्रों में,पत्रिकाओ में,सेमिनारों में बड़ी बड़ी लेखों को प्रकाशित करते हैं, वक्तव्य देते हैं और फिर भी वे सभी दृष्टिकोण से देश मे सामान्य जन से ज्यादा सुरक्छित और सुरक्छा में रहते हैं।बास्तब में ये लोग अंतरराष्ट्रीय भारतीय षड्यंत्र के हाथों खेलते है जिन्हें देश की उन्नति और अंतरराष्ट्रीय सम्मान रास नही आता है

Thursday, 13 December 2018

संस्कार और उसका महत्व


                                            संस्कार और उसका महत्व

  •                 संस्कार हमारी जीवन में जीवन को पूर्ण बनाने का एक अभीष्ट गुण है ,जिससे हम पूर्ण हो के शुद्ध आचरणों से अलंकृत होते है और मनुष इन्ही गुणों के कारन  अपनी सहज प्रवृतियों का सम्पूर्ण विकाश करते हुए अपने स्वम् और अपने समाज का कल्याण और विकाश करता है |
  •         संस्कार मनुष्य के अंदर अपने बुरे कर्मो को दूर करने की शक्ति के साथ साथ अच्छे कर्मो और कृतो  को अपनाने के गुणों का विकाश करता है जिससे मनुष स्वम् के साथ साथ अपने परिवार और समाज का विकाश को और अग्रसर होता है |
  •           संस्कार से  सामान्य अर्थ में हम समझते है कि संस्कार मनुष का वह गुण है जो उसको एक अच्छी और शभ्य , सुसंस्कृत मनुष्य बनने की गुणों को उसके अंदर विकाश करता है |
  •      संस्कार मनुष्य को बुरे विचारो ,अज्ञानता ,अंधकार से बाहर निकाल कर हमारे आचार,विचार को शुद्ध कर अच्छे कार्यो और ज्ञान –विज्ञानं से युक्त करता है |इससे हमारा सामाजिक और अध्यात्मिक जीवन पूर्ण होता है |हमारे व्यक्तित्व से निर्माण में काफी सहायक होता है |मेरे मन,वाणी और कर्म को शुद्ध ब्नानता है |
  •          हमारे समाज में संस्कार बच्चो अपने बड़ों से ग्रहण करते ,सीखते है | इस प्रिक्रिया का हमारे जीवन में बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है ,जिसकी नीव मनुष्य की जन्म  लेने के साथ ही प्रारंभ हो जाता है| या यो कहा जा सकता है की बच्चा जब माँ के गर्व में रहता ही तभी से इसमें संस्कार के गुणों का बिकाश शुरू हो जाता है |बच्चे की माँ की सोच  ,स्वाभाव और प्रकृति जैसा होगा उस बच्चे पर उसका प्रभाव भी उसी सोच,स्वाभाव और प्रकृति  का पड़ता है |इसका सबले अच्छा उदाहरण और प्रसंग  हमारे धर्म ग्रन्थ महाभारत में आता है जब अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था तो अर्जुन अपनी पत्नी को युद्ध के चक्रव्हू से कैसे निकला जाय  की रणनीति सुना रहे थे ,लेकिन  में ही उनकी पत्नी कहानी सुनते सुनते बीच में ही  सों गयी और पूरी रणनीति नही सुन स्की जिसका नतीजा सभी जानते है |
  •         परिवार समाज में बच्चा जिन जिन कार्यो को अपने बड़ों से क्रमबद्ध रूप  सीखता है ,उसी सिखने की प्रक्रिया को संस्कार का आरंभ माना जाता है जिसे बच्चा बचपन में ही प्रहण करता है | बच्चा अपने परिवार में अपने बड़ो से जिन आदतों को अपने बचपन में देखते  हुए बड़ा होता है ,जिसे देख कर करते  हुए बड़ा होता है उन्ही आदतों का प्रभाव उस पर पड़ता है और  इसी प्रक्रिया को संस्कार की नीव डालना कहा जाता  है, जो बचपन में ही पड़ता है |  बच्चा जब भी अच्छी और बुरी कार्यो के देखता है उसकी अंदर वैसी ही आदत पड़ती है |
  •          जब हमारे परिवार में बड़े ,बुजुर्ग आते है या बाहर जाते है तो घर छोटे बच्चो को बताते है की बेटा आपके रिश्ते में चाचा ,दादा ,या जो भी रिश्ता होता है उसे बताते है और तदनुसार  उन्हें पैर छु के प्रणाम करने की कहते है और तब बच्चा यह जनता है की अपने से बड़ो को कैसे प्रणाम किया जाता है |यहाँ तक की बच्चे अपने से बड़ो को जब ऐसा ही करते देखते है तो उसे नकल भी करते है और इसी तरह बे सीखते है |हम घर में जब कोई कार्य करते है तो बच्चे ध्यान से देखता है और उन्ही कार्यो को नकल करते है | |इस तरह की सिखने की गुण को ही संस्कार का प्रारंभ कहते है जो परिवार से ही प्रारंभ होता है |
  •       आप अपने बडो ,बुजुर्गो और दुसरे के साथ जैसा भी ब्यवहार करते है आपके परिवार में आपके छोटे बच्चो पर उसका काफी असर पड़ता है और उही उसको आदत और स्वभाव बन जाता है |;अगर उसने अपने से अच्छी आदते और शिक्छा ग्रहण की तो उसमे अच्छी आदते पड़ेगी बरना बुरा |यही आदते बच्चो  में संस्कार पैदा करना  कहते है |आप जैसा करेगे आपके छोटे वैसा ही सीखेगे |इसीलिए कहा जाता है की आप छोटे बच्चो के सामने ना तो गलत काम करे और ना गलत भाषा का इस्तेमाल करे क्योकि इसका असर बच्चो पर पड़ता है |
  •         हिन्दू शस्तो में संस्कार का मतलव उस धार्मिक कार्यो से था जो किसी व्यक्ति को अपने परिवार   ,समाज के विकाश और उन्नति के योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके अंदर सद्गुणों का विकाश कर मनुष्य के शरीर ,मन ,मष्तिष्क को पवित्र करने को था जिससे व्यक्ति के अंदर अभीष्ट गुणों का जन्म हो सके |
  •       हमारे धर्म में संस्कारो का प्रारंभ जीवन में इस अबस्थाओ में ही हो जाता है जिनमे –ग्राभाधारण , संतान्नोत्पत्ति , उसके बाद नामांकरण , अन्नप्राशन , चूडाकरण , उपनयन , ब्रह्मचर्य , बिबाह संस्कार के माध्यम से अपने गृहस्थी जीवन में मनुष्य प्रवेश करता है जहाँ से मनुष्य पुनः इन्ही संस्कारो को अपने बाद की पीढ़ी में डालते हुए अपनी अंतिम संस्कार की यात्रा की और प्रस्थान करता है |
  •           हमारे अभी के समाज में आजकल इन्ही संस्कार की कमी हो गयी है जिसका परिणाम है कि  हमारे परिवार ,समाज की अगली पीढ़ी के बच्चो में इन संस्कार रूपी गुणों का आभाव हो गया है और समाज में चारो और तनाव, गुस्सा के साथ साथ बुरी भावनाओ का आगमन हो गया है जिससे हमारा समाज बिकृत विचारो और कृतो के दलदल में फस  गया है |
  •       समाज के बड़े लोगो की यह जवाबदेही है की वे अपने अच्छे आचरणों और विचारी से अपनी अगली पीढ़ी को अवगत करावे |आपके बच्चे आपके कार्यो और विचारो को जव देखेगे तो उसका वे अनुसरण करेगे | कहा भी  जाता है की child  learn by doing .इसलिए आप अपने आदतों में सदाचार ,सद्गुण लाये और अच्छे कार्यो की करे ताकि आपकी अगली पीढ़ी सदाचारी, शभ्य ,बने |
  •           

Saturday, 30 June 2018

कैथी लिपि

कैथी लिपि-------
   
कैथी लिपि जिससे अंग लिपि भी  कहा जाता है | देश स्वतंत्र होने के पूर्व यह लिपि देश के अधिकांश भागो की  जन लिपि थी ऐसा कहा जा सकता है | यही कारन था की शेरशाह जैसे अधिकांश शाशको ने अपने राजकाज के लिए इसी कैथी लिपि को राजकाज की सञ्चालन की भाषा और लिपि अपनाई और इसे ही बिकसित ,और संरक्छन दिया।  उस समय सामान्य जन की लिपि कैथी लिपि ही हुआ करती थी राजकाज के सामान्य कार्य के अलावा लोगो की दैनिक लिखा पढ़ी की एक महत्वपूर्ण  लिपि थी। 
कालान्तर में जब देश पर अंग्रेजो का शासन  हुआ करता था उस समय अंग्रेजी राज्य में भी कैथी भाष तो गुजरात के कच्छ से ले कर कोशी छेत्रो तक की  राजकीय लिपि बनाई गयी  था। सरकार के सारे  कार्य के अलावा उस समय के न्याययिक कार्यो के साथ साथ  आम जन की कैथी ही सर्वमान्य और समृद्ध लिपि थी इस भाषा लिपि के कारण अंग्रेजो और उसके पूर्व के जमाने के सभी सामान्य जन की लिपि कैथी लिपि ही थी . कैथी भाषा में उस समय के अधिकतर कागजात ,पत्र आदि  लिखी मिलती थी और अभी भी मिलती है |पुराने सरकारी दस्ताबेजो को पढने के लिए तो अभी भी राज्य और कन्द्रीय सरकारों को कार्यालयों में बजापते सूचना प्रसाशित कर इस भाषा और लिपि के जानकर लोगो को ऐसे कागजातों को पढ़ने के लिए राशी भुगतान कर रखा जा रहा है क्योकि उस समय के बहुत सारे कागजात में क्या लिखा है जानना जरूरी है |खास कर जमीन जायदाद के मामले में तो और जरूरी होता है जहाँ पुराने  सारे के सारे कागजात कैथी लिपि में ही लिखी मिलती  है | .
जब देश आजाद हुआ तो उस समय की सरकार ने इस भाषा पर ध्यान नही दिया और घिरे धीरे यह कैथी लिपि  लुप्त होते चली गयी . मैंने अपने बचपन में देखा है की मेरे पिता जी आपस में जिन पत्रों को लिखा करते थे वे सभी पत्रों की लिपि कैथी लिपि ही हुआ करती थी | अभी भी मेरे घरो में कैथी लिपि की लिखी हुई कई दस्ताबेज मौजूद है |.
जिस तरह देश में अन्य लिपिओ का विकाश हुआ उसी  तरह कैथी लिपि को किसी ने विकाश पर ध्यान नही दिया और यह लिपि धीरे धीरे लुप्त के कगार पर आ गयी है |.कैथी लिपि पहले मुख्य तौर पर कायस्थ जाती की लिपि थी . कायस्थों की मुख्य जीविका का साधन यह  लिपि थी . पहले गाँव घरो में अधिकतर लोग जो पढ़े लिखे नही होते थे अपने पत्रों को  या कोई भी सरकारी कागजात या फिर जमीन,घर आदि के कागजात को पढ़ाने केलिए इन्ही  समुदाय के पास जाते थे |इस समुदाय के लोगो का मुख्य जिविकी का श्रोत था .लेकिन आजादी के बाद इस समुदाय  के जीवन निर्वहन के साधन को  बनाये रखने पर कोई ध्यान नही दिया गया | इसका परिणाम यह हुआ की इस लिपि के जानकारी रखने बालो की तायदाद धीरे धीरे छिन्य होती चली  गयी |  अब तो स्थिथि यह है की इस लिपि को जानने बालो को बड़ी मुस्किल से खोजी जाती है | यहाँ तक की इस लिपि के बिषय में अब लोग जानते भी नही है की ऐसी भी कोई लिपि कभी रही थी |
जहाँ तक मेरी जानकारी है जो अपने पिता जी से सुना था की कैथी लिपि की उत्पत्ति कायस्थ शब्द से हुई है |देश  में अंग्रेजो की शासन के पूर्ब मुगलकालीन शासनों में भी कैथी लिपि देश की राजकीय भाषा के रूप में स्थापित थी |इसके बाद अंग्रेजो के शासन काल में भी इस भाषा का उपयोग राजकीय दस्तावेजो में मिलता है ,इस से यह भी प्रमाणित होता है की इस भाषा का उस समय को राजकाज पर पूरा और स्पस्ट छाप था  |उस समय के जमीन ,लगानो ,क़ानूनी दस्तावेजो ,दानपत्रो ,पत्रों में स्पस्ट रूप से देखा जा सकता है |
                  कैथी भाषा और इसकी लिपि को मुख्यत ; तीन प्रकार थे जिनका तात्कालिक समय में उपयोग किया जाता था |उनमें ---तिरहुत कैथी लिपि , मगही कैथी लिपि , और भोजपुरी कैथी लिपि | इस लिपि का बिस्तार जहाँ तक मुझे बचपन में पिता जो द्वारा बताया गया था और जो मुझे याद है के अनुसार असाम , मगध , बंगाल , गुजरात के कछ छेत्र तक था |इसके साथ साथ इस लिपि का बिस्तार उत्तर प्रदेश , उड़ीसा , अवध  , के साथ साथ देश के बड़े हिस्सों में था और इन छेत्रो की सरकारी कामकाज की लिपि यही कैथी लीपि थी |कैथी लिपि काफी सम्ब्रिध लिपि उस जमाने की थी |
कैथी लिपि की वर्णमाला कुछ इस प्रकार है जो  मैंने अपने स्तर से लिखी है --




इधर मैंने बिहार के दैनिक समाचार पत्रों में देखा है की बिहार सरकार के द्वारा भी कुछ लुप्त हो रही लिपि और भाषाओ को पुनः जागृत करने के प्रयास में इस कैथी भाषा और लिपि का भी स्थान दिया गया है |बस्ताव में राज्य के कैथी भाषा के जानकार लोगो के लिया एक अच्छी खवर है |
            अगर इस लेख को लिखने में कुछ कमियां हो तो मुझे भी जानकारी होनी चाहिये |वैसे मै कोई भाषा का जानकार नही हूँ |वस इस भाषा की उत्पत्ति समुदाय से हूँ और दिमाग में आया की इसके बारे में जो भी मेरी जानकारी है में  अपने बिचार लोगो से साझा करू |इसी सोच से इस लिख  को प्रस्स्तुत किया हूँ |
  शेष टिप्पणी की प्रतिच्छा में |.

Monday, 18 June 2018

जो आसानी से मिलती है उसकी कद्र नही

जो आसानी से मिलती है उसकी कद्र नही
---------------------------------------------
जब मे छोटा था और अपने परोस के गाँव के सरकारी स्कूल में पढाई करता था तब मेरे पिता जी मुझे घर पर पढ़ाने के लिए एक टीचर रखे थे जो मेरे गाँव के ही थे और मुस्लिम थे .वे मेरे घर पर रहते थे और वहीं उन्हें खाना और पढ़ना रहता था | वे मेरे अलावा मेरे चचेरे भाई को भी पढ़ाते थे | मुझपर उनकी थोड़ी ज्यादा कृपा दृष्टी रहती थी |

एक दिन उन्होंने जो एक कहानी हम लोगो को सुनाई. उसकी गूंज आज तक मेरे कानो में मौजूद है | कभी कभी वे शब्द अनायास कानो में बजने लगते हैं जैसे कि  आज एकाएक महसूस हुआ | मै उस कहानी को आपके साथ साझा कर रहा हूँ -------

एक शहर में एक संपन्न व्यक्ति रहते थे जिनका अपना कारोबार शहर में था . बड़ा खुशहाल परिवार था और उस परिवार में ज्यादा सदस्य भी नही थे . उनकी पत्नी भी काफी सुशिल सदभावी और सुसंस्कृत धर्मपरायण महिला थी | शादी के कुछ दिन बाद उस व्यक्ति के घर में एक बालक का जन्म हुआ | काफी धूमधाम से उस बालक की आने के अवसर पर जश्न मनाया गया.  कुछ दिन और जब बीता और बालक कुछ बड़ा हुआ तो उनकी पत्नी की तबियत खराब रहने लगी | चिकित्सक से देखने पर उन्हें टी ०बी० की बीमारी बताया गया | बहुत पहले यह बीमारी लाइलाज बीमारी मानी जाती थी |

कुछ दिनों के इलाज के बाद उनको पत्नी का इंतकाल हो गया | घर के और लोगो ने तथा परिजनों ने उनपर दवाब बनाया कि  बच्चा छोटा है घर में देखभाल के लिए कोई नही है इस कारन आप दूसरी शादी कर ले | लेकिन उस भद्र पुरुष ने किसी की एक ना सुनी और दूसरी शादी नही की | अपनी कारोवार के साथ साथ अपने बालक को बड़े लाड प्यार से पढ़ाया और बड़ा किया |लड़का उनके ही साथ उनके कारोवार में हाथ बटाने लगा | धीरे धीरे बालक शादी के योग्य हो गया | पिता ने अपने पिता धर्म निभाते हए उसकी शादी कर दी | घर का माहौल काफी खुशनुमा हो गया |

कुछ दिन और बीतने के बाद पिता ने सोचा, अब मुझे अपना सारा कारोबार अपने बेटे को सौप कर मुझे आराम की जीबन बिताना चाहिए | बेटा से अपने मन की बात साझा किया |बेटे ने आदर्श पुत्र की तरह ही पिता की इक्छा का सम्मान किया |
पिता अपना सारा कारोवार अपने बेटा को सौप कर आराम की जीवन जीने की लालसा से जी रहा था |

कुछ ही दिन बीते थे की एक दिन पिता खाने के टेबल पर था और उसकी पुत्र बधू उसको खाना परोसी थी |जब खाना परोस कर लायी तो बाप ने देखा की उसके सामने रोटी लायी गयी वह बिना घी के थी | इन महाश्य की आदत थी की जब भी वे खाना में रोटी खाते थे तो रोटी में घी लगना आवश्यक था |पिता ने कुछ नही कहा और खाना खा लिया | जब वे खाना कहा रहे थे तो बेटा जो उनका अब सारा कारोवार सभाल रहा था अपने काम से वापस घर आया, उसने अपने पिता को खाता देखा था |

बाद में उसकी पत्नी ने उसे भी खाना खाने हेतु खाना परोस कर लायी | उसके खाने में उसने देखा की उसको जो रोटी खाने को रोटी दी गयी उसमे घी लगी है |उस समय बेटे ने कुछ नही किसी से बोला और चुप चाप रहा |

दुसरे दिन पुत्र ने अपने पिता से कहा कि पिता जी अब आप पुनः अपना कारोवार सभाले और मै आप के कारोवार में एक कर्मचारी की भांति काम करूँगा और अब मै आप के साथ भी नही रहूँगा | मै अब अलग एक किराये के मकान में अपनी पत्नी के साथ रहूँगा | पिता ने समझाया, लेकिन बेटा नही माना और अपने पिता का घर छोड़ कर एक किराया के मकान में चला गया | पिता ने इतना कहा की कारन क्या था अब तो तुम मुझे बताओ |

पिता के कहने पर पुत्र ने सारी कहानी बताई और कहा कि पिता जी, जब मै ने देखा की आप के द्वारा रोटी में घी लगाने को कहने पर भी घी ख़त्म होने को बात बताई गयी और घी नही मिला ,उसी समय मेरे खाने में रोटी में घी लगा मिला तो मै ने तय किया कि आराम से बिना कुछ किये अगर किसी को कुछ मिलता है तो उसकी कीमत वह नही अंकता है |

इस बात को सुन कर उसकी पत्नी को अपने किये पर काफी अफसोस हुआ और उसने पिता से माफी मांगी | फिर सभी पिता पुत्र पुत्रबधू साथ साथ रहने लगे |

मुझे लगा की मै उतनी पुराणी कहानी आपके साथ सेयर करू इसलिए मै ने यादास्त को तरो 

Thursday, 12 June 2014

                                क्या विचार नहीं किया जा सकता .........

                          मै अपने आसपास काफी दिनों से ये देख रहा हूँ की आज कल हमारे समाज के अन्दर एक ऐसा बर्ग काफी तेजी से फैल रहा है जिनकी शौक है पालतू जानवरों को पलना | मै यह नहीं कहता हूँ या सोचता हूँ की जानवरों को पलना गलत है | वल्कि यह तो अच्छी वात है की लोग अपने घरो में पालतू जानवर को पाले | जानवरों के पलने से कई तरह के फैदा होता  है | आजकल तो सरकार और गैरसरकारी कई ऐसे संसथान है जो आमआदमी के विच इस प्रकार की प्रविर्ती को वडावा देते है |
                          लिकिन फिर भी इनसब बातो के होने के बाबजूद भी इस प्रकार की बात जिसका मै जिक्र करने जा रहा हूँ पर गौर करना भारत जैसे देश के लिए मेरी समझ से आवश्यक लगता है |
                             आज कल हमारे आसपास  कई ऐसे परिवार देखने को मिल जाते है जिनका शौक पालतू जानवर पलने को है | खास कर के पालतू जानवरों में देशी या विदेशी नश्ल की कुत्ता को पलने की | मेरे आगे फिछे , अगल बगल में काफी ऐसे परिवार रहते है जो आर्थिक दशा के लिहाज से एकदम सामान्य आर्थिक हालात बाले है , लेकिन  वे भी  कुत्ता पाले हुए है | मझे उनसे कभी कभी बाते करने का मौका मिलता है तो वे बड़े ही गर्व  से मुझे उस कुत्ते की देखभाल करने से ले कर उसकी चिकित्सा पर होने बाले खर्च के बारे में काफी विस्तार से बताते है | उन्हें उस छन मै उनकी चहरे की आव भाव को देखता हम तो मुझे ऐसा आभास होता है की वे अपने को  काफी गौरवांन्वित महसूस करते है |
                               सामान्यतया एक कुत्ता को पलने पर काफी ध्यान देना परता है  | जैसे कुत्ता को सामान्य से उसके लिए बनाये गए खास प्रकार के खाने की सामग्री को बाजार से खरीद कर लाना परता है | इस प्रकार के खाने के सामान अच्छे खासे दामो पर लिया जाता है | उसको प्रतिदिन या एक दो दिन बिच करके मांसाहारी खाना देना परता है | उसकी देखभाल भी अपने आप में काफी खर्चीला होता है | प्रतिदिन उसे स्नान करने से लेकर इसकी साफ सफाई , इसकी डाक्टरी सलाह और दवाई पर खर्च , इसके रहने और इसकी देख्भाल के लिए एक आदमी खास तौर पर रखना परता है | आज कल का कुत्ता तो पहले के कुत्ता से काफी आधुनिक हो गया है | आज तो इस तरह के सौक रखने बाले अपने ही तरह इस कुत्ता को भी बतानुकुलित में रखते है , उसे बतानुकुलित गाड़ी में अपने  साथ घुमाते है . | शाम सवेरे उसको नित्य कर्म के लिए बाहर जरुर ले जाते है |उसको हवाखोरी के लिए प्रतिदिन गाड़ी से सैर कराते है |
                              इसे लोगो की एक और प्रविर्ती होती है की वे अपने कुत्ता को अपने साथ गाड़ी पर घुमाने के साथ साथ इससे काफी खेलते है | अपने साथ अपने सोफा अपने बिछवान पर साथ में सोलाते भे है | अपने मुख और चेहरे को कुत्ता से और कुत्ता के मुख को अपने से काफी लार प्यार से चुमते है | उससे काफी खेलते है | उसे अपने गोद में ले कर घुमाते है और इस हालात में वे अपने को काफी गौवान्वित महसूस भी करते  है |
                             इस प्रकार के शौक पलने वाले को प्रति माह एक अच्छी राशी खर्च होती है | जहाँ तक मै समझता हूँ ,इन मामलो में कम से कम पांच हजार से ले कर वीस - पचीस हजार रूपये तो अवस्य ही खर्च होते होगे | ऐसे लोग काफी यह महसूस नहीं करते है की जितना पैसे वे इस पर खर्च करते है इतना पैसे से भी कम पैसे प्रतिमाह  कमाने वाला ब्यक्ति अपने साथ साथ अपने परिवार का भरन पोसन करते है |
                             ऐसे ब्यक्ति में अगर थोड़ी भी समबेदना होती और अपने आस परोस में ऐसे हजारो अनाथ बच्चो को देखते  और इनमे थोड़ी भी दया भाव आता  तो अगर ऐसे बच्चो की थोड़ी आर्थिक मदद करने की भावना हो जाये तो उस अनाथ बच्चो का भविष्य बदल जायेगा |
                                अगर ऐसे आदमी एकाध अनाथ बच्चो को adopt कर उसको परवरिस करे तो वह अनाथ बच्चा भी एक दिन देश का सभ्य और सुसंस्कृत नागरिक बन कर न अपने बल्कि अपने समाज और देश की सेवा कर पायेगा | और ऐसे बालक में यह भावना पनपेगी की मै भी अपने साघन से एक और अनाथ बच्चे को मदद करू |
                                हमारे देश में लाखो लावारिस बच्चे सड़क , रेलवे स्टेशन , बाजारों ,चौक चौराहों पर धूमते रहता है | ऐसे बालक रास्ता भटक जाते है और कई प्रकार के गलत और असमाजीक कार्य करते है | ऐसे लडको  में अपराधिक भावना पलती और फूलती है और एक दिन ऐसे ही बच्चे अपराध जगत के नमी अपराधी बन जाते है जो समाज और देश के लिए घातक होता है |
                               क्या यह अवश्यक नहीं है की कुत्ता ऐसे सौक को पलने बाले थोडा इस पर भी घ्यान दे और सोचे | उनके इस प्रयास से उस अनाथ बालक का तो भला होगा ही लेकिन उससे ज्यादा भला मानवता और समाज तथा देश का होगा | एक सभ्य नागरिक, सभ्य समाज और सभ्य तथा सवाल देश बनाने में वैसे महानुभाभो का जो योगदान होगा वह अतुलनीय होगा और उनके धन बल का सही उपयोग भी होगा | इससे इन ब्यक्ति को जहातक मै सोचता हूँ अपार अन्तः सुख और आन्नद की अनुभूति होगी |

                               इन्ही बिचार के साथ अब मै अपनी लेखनी को बिराम देता हूँ |

Wednesday, 31 October 2012

तब तक ही सही ये सपने

आपके लिए  और सिर्फ आपके लिए,

                    मैंने भी कुछ सपने सजाये है ,

मैंने भी कभी कुछ सोचा था ;

                      मैंने भी कभी कुछ सपने सजाये थे ,

आपके लिए और सिर्फ आपके लिए।

                        क्या सपने सजाना गुनाह था ,

क्या सपनो को देखना गुनाह था ,

                          नहीं ,तो देखा था मैंने भी सपने ;

आपके लिए और सिर्फ आपके लिए।

                           जब तक सपना नहीं सजता ,

जब तक नीद नहीं खुलती ,

                           तब तक सिर्फ तब तक देखने दे सपने  ;

आपके लिए और सिर्फ आपके लिए . .

                           सपने में सब कुछ ऐसा लगता है,

जैसे की वाश्ताविकता के पास हो,

                              इतने पास की कभी दूर न लगे;

तब तक ही सही ये सपने ,

                             आपके लिए और सिर्फ आपके लिए .

मैंने भी कुछ सपने सजाये ,

                           मैंने भी कुछ सोचा था आपके लिए ;

आपके लिए और सिर्फ आपके लिए .

                             ----------------------- 

Sunday, 12 August 2012

आज के युवाओ में भटकाव का कारण

    1.                     इधर कुछ अर्सो से देश के चाहे एलोक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिंट मिडिया उसमे प्रमुखता से समाचर आते रहते  है जिस में से ऐसा लगता है की हमरे  देश  के युवा वर्ग निचितरुप से रास्ता से भटक गया  है .उसमे अपनी सभ्यता ,संस्कृतियों,और मान्यताओ की कोई अहमियत नहीं रह गई है .ऐसा नहीं  है की ये बात देश के सभी युबाओ पर सामान रूप से लागु होती है . हमारे देश के बहुतायत में युबाओ में देश समाज और पारिवारिक संस्कार भरी है जिनके बदौलत हमारा देश अभी भी अपनी सभ्यता ,संस्कृति और मान्यताओ को न केवल सहेज कर रखे हुआ  है बल्कि अपनी पीढ़ी के साथ साथ आगे भी बढ़ाते जा रही है .

                    समाज ,देश या परिवार की अच्छाई या बुराई की पहचान के लिए उस समाज ,परिवार या देश की  कुछ लोगो को उदाहरण के लिये लिया जाता है और उसी के अधर पर उसका आकलन किया जाता है .हमारे देश की युबा बर्ग को बदनाम करने के पीछे कुछ भटके युबाओ का हाथ होता है लेकिन बदनामी तो युबा बर्ग की होती है .तो ऐसी हालात में युबा बर्ग के अन्य सदस्सो की जिम्मेबारी बनती है की वे अपने बीच भटके साथियो को सुमार्ग पर लाने के  लिए आगे आये.
                      अब आइये हम देखते है की आज के भटकते युबा बर्ग के  पीछे वह कौन से कारण है जिनके चेलते युबा समाज के चन्द युबा अपनी सही रास्ते से भटक गए है .जब हम इसके पीछे कारणों को देखते है तो मुझे तो उन युबाओ के भटकाव के पीछे उनका कम मगर उनके माता -पिता का ज्यादा हाथ नजर अता है .अब आप कहेगे की भटकता तो युबा है तो ऐसी हालात में उनके माता पिता को कैसे दोष  दिया जा सकता है .तो आइये हम इसकी कारणों का परताल करते  है ताकि आप मेरी तर्क को सही करार दे सके ---------
                        कारण न० १ -- हमारे  परिवार की संरचना पहले संयुक्त परिवार की थी .ऐसी हालात में परिवार के सभी सदस्य एक दुसरे के बच्चों का ख्याल अपनी बच्चों के तरह रखते थे .माता पिता अगर बहार भी रहते तो परिवार के अन्य लोग बच्चों के पढाई , उनके साथी -सांगतो और उनकी अन्य समस्याओ पर कड़ी नजर रखते थे .इस कारण जब वे युबा बनते थे तब तक तो वे पारिवारिक मूल्यों , आपसी समझ ,भाईचारा और सहिष्णुता की ज्ञान परिवार से पा लेते थे .उनमे सारी पारिवारिक गुणों की भरमार हो जाती थी .
                            आजकल हमारे समाज में संयुक्त परिवार का टूटना एक जबरदस्त कारण मैं मानता हूँ .
                         कारण न० २ --एकल पारिवारिक पद्धति का विकास .एकल परिवार में पति  पत्नी और बच्चे .उनकी सोच समझ अपने  तक ही सीमित रहती है .उनमे पारिवारिक मूल्यों जिनके रहने से उन्ही जीवन के सफर को तय करना है की लम्बी सफर के लिए आबस्यक शिक्षा नहीं मिल पाई.उनमे अपने तक सिमित रहने और अपनी भलाई , उन्नति तक की ही सोच का विकास हुआ .जो युबाओ के भटकाव का कारण बना .इन्ही पारिवारिक मूल्यों और स्थापित मान्यताओ के कारण यह कहा गया है की '' परिवार ही बच्चों की प्रथम पाठशाला है ''.
                            कारण न० ३ --- माता पिता का कामकाजी होना .आज के समाज  में हर व्यक्ति अधिक से अधिक धनार्जन अपनी वुधि और छमता से करना चाहता है .इसके लिय पति पत्नी दोनों पढ़े लिखे होने के कारण नौकरी करना चाहते है और करते भी  है ,जिसके कारण उनके पास समय नहीं होता की वे अपने बच्चो की पढाई पर पूरा ध्यान दे सके .उन्हें तो बस ये फिक्र रहती है की बच्चो की पढाई में किसी सामान की कमी न हो .उन्ही उनकी पढाई पर ध्यान देने का समय नहीं होता  है.अपने बच्चो की पढाई के प्रति उदासीनता भी बच्चो को गलत रह ले जाता है  लेकिन उसे भी माता पिता नजरंदाज कर   देते है .
                      उस परिवार में तो आर्धिक सम्पन्ता तो अजाती है लेकिन उनके बच्चो में पारिवारिक मान्यताओ ,मूल्यों और शिक्षा का उस  स्तर तक विकास नहीं हो पता है .
                        मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है की सभी कामकाजी माता पिता  के बच्चे पर यह फार्मूला लागु होता है .इसमे भी जो माता पिता अपने बच्चो की पढाई और पारिवारिक मूल्यों और संस्कारो की शिक्षा देते है उन मामलो पर यह लागु नहीं होता  है .लेकिन सभी कामकाजी माता पिता ऐसा ही करते है यह भी लागु नहीं होता है .
                        कारण न ० ४ ----पेरेंट्स के द्वारा अपने बच्चों को बिना सोचे समझे महगे से महगे आधुनिक गदट्स को मुहैया करना .चाहे मोबाइल ,लेपटॉप हो  या मंहगे बाएक येहाँ तक की फोर व्हीलर तक अपने बच्चों को स्कूल के स्तर की पढाई होते होते सुलभ करना अब एक सामान्य सी हो गयी है .इसके साथ साथ अब बच्चों को एक मुश्त मोटी राशी प्रति माह पॉकेट मनी दी  जाती है जिससे उनमे बिना सोचे समझे खर्च करने की प्रविर्ती का बिकाश होता है .उन्हें यह समझ नहीं आता की पैसा कितना कठिन  से कमाया जाता है.
                                माता पिता  द्वारा बच्चों  को कभी नहीं समझाया जाता है की पैसे कमाने में क्या तकलीफ होती है .
                            इस कारण मेरी नजर में बच्चों को  बहकाने में उनके माता पिता का  सबसे ज्यादा हाथ होता है. वे बिना सोचे समझे पैसा देते है और यह नहीं देखते है की उन पैसे का उनके  बच्चें सही उपयोग कर रहे है  या  नहीं.
                            अगर बच्चों की चाल ढाल खारब हो जाता है और अगर कोई सम्बन्धी या आस परोस  का ब्यक्ति उन्ही उनके बच्चों  की शिकायत करते है तो उन बच्चो के माता पिता उसे उसी आदमी को भला बुरा कहते है .अगर उन माता पिता इस शिकायत को ध्यान दे कर अपने बच्चों पर नजर रख सुधार की कोशिश करते तो उनके बच्चे नहीं बीगड़ पते .
                           इसका एक बहुत  बड़ा कारण है की इस भ्रष्टाचार के युग में अगर गौर करेगे तो साफ साफ पता चलेगा की एन बिग्रैल बच्चों में अधिकतर उनके बच्चे है जिन्होंने गलत तरीके से धन कमाया है .उन्हें गलत तरीके से धन कमाने से फुर्सत ही नहीं है की यह देखे की उनके बच्चे क्या करते  है .उनकी पढाई कैसी चल रही है .उनकी संगती कैसे लडको के साथ है .उन्हें अच्छा और ख़राब की शिक्षा दे सके.
                                  इस कारण मैं उनके माता पिता का ज्यादा दोष मानता हूँ .
                             कारण न ० ५ ----  इन्टरनेट का दुष्परिणाम .इन्टरनेट आज के  समय का एक आवश्यक एवं अहम् हिस्सा पढाई का हो गया है . इन्टरनेट पर पढाई और ज्ञान की भरमार के साथ साथ आपत्ति जनक सामग्रियो की भी भरमार है .आज के माता पिता अपने बच्चों को कोम्पुटर और इन्टरनेट की सुबिधा को मुहैया इस कारण से  कराते है की  बच्चों की पढाई में काफी सहयोग मिलेगा. लेकिन ऐसा भी देखने को मिला है की बच्चों के द्वारा इसका दुरूपयोग किया जा रहा है.यह अलग बात है की  परेंट्स को इन मामलो पर फी ध्यान देना चाहिए .लेकिन इससे अधिक आवशक यह है की बच्चें इन्टरनेट पर अनावश्यक आपत्तिजनक सामाग्रियो से अपने को दूर रखे .
                            कारण न० ६ ---- प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया .आजकल टेलीविजन पर ऐसी ऐसी प्रतिविम्बो ,ताशविरो, बिग्यापनो को दिखाया या छपी जाती है की इसका भी काफी असर युबा मानसिक पर पड़ती है जो इनको भटकाओ में काफी सहायक होता है .
                                   मैंने अपने  इस लेक के माध्यम से जहाँतक मैंने देखा समझा और महसूस किया की हमारे युवा जो आज गलत राह पर जा रहे है उनके पीछे क्या कारण है ,तो मैंने जिन कारणों को पाया उसी की वर्णन किया है .अगर कोइ सुझाव या टिप्पणी पाठकों की हो तो वह स्वागत योग होगा .